
दिट्ठे तु म्मि जिणवर, परमाणंदेण पूरियं हिययं ।
मज्झ तहा जह मण्णे, मोक्खं पि व पत्तमप्पाणं ॥3॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! परमानन्देन पूरितं हृदयम् ।
मम तथा यथा मन्ये, मोक्षमपि वा प्राप्तमात्मानम्॥
प्रभो! आपके दर्शन से है, मन में परमानन्द भरा ।
मानो मुझे आज ही हे प्रभु! मुक्तिपद साक्षात् मिला॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आपको देखने से परमानन्द से भरे हुए मेरे मन में ऐसा लगता है, मानो मैं ही साक्षात् मोक्ष को प्राप्त हो गया हूँ ।