+ अन्त में इस दर्शन-स्तोत्र को पृथ्वी पर वृद्धिंगत करने की भावना -
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, भणियमिणं जणियजणमणाणंदं ।
भव्वेहि पढिज्जंतं, णंदउ सुयरं धरावीढे ॥34॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! भणितमिदं जनितजनमनानन्दम् ।
भव्यै: पठ्यमानं, नन्दतु सुचिरं धरापीठे॥
प्रभो! आपके दर्शन कर यह, जन-मन आनन्ददाय रचा ।
पढ़ने योग्य कहा भविजन को, पृथ्वी पर हो वृद्धि सदा॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आपको देख कर रचित एवं कथित यह स्तवन, समस्त भव्य जनों के मनों को आनन्द देनेवाला है और भव्य जीवों द्वारा पठ्यमान (भव्य जीव जिसका सदैव पाठ करते हैं) - ऐसा यह दर्शन-स्तोत्र, इस पृथ्वी पर सदैव वृद्धि को प्राप्त हो ।