
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, पोम्मकयं दंसणत्थुइं तुज्झ ।
जो पहु पढइ तियालं, भवजालं सो समोसरइ ॥33॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! पद्मनन्दिकृतां दर्शनस्तुतिं तव ।
य: प्रभो पठति त्रिकालं, भवजालं स स्फोटयति॥
प्रभो! आपके दर्शन कर यह, पद्मनन्दि आचार्य रचित ।
दर्शन-स्तुति जो त्रिकाल पढ़ता, वह हो भवजाल रहित॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! जो भव्य जीव, पद्मनन्दि आचार्य द्वारा रचित इस दर्शन-स्तुति को तीनों काल पढ़ता है; वह जीव, संसाररूपी जाल का सर्वथा नाश कर देता है ।