
अपेक्षते यन्न दिनं न यामिनीं,
न चाऽन्तरं नैव बहिश्च भारति !
न तापकृज्जाड्यकरं न तन्मह:,
स्तुवे भवत्या: सकलप्रकाशकम् ॥2॥
मात! आपका तेज रात-दिन, अन्तर-बाहर से निरपेक्ष ।
जड़ता अरु आताप करे नहिं, सकल पदार्थ प्रकाशित हों॥
अन्वयार्थ : हे सरस्वती! आपका तेज न तो दिन की अपेक्षा करता है और न रात्रि की, न भीतर की अपेक्षा करता है और न बाहर की । जो न जीवों को सन्ताप देनेवाला है और न जड़ता, अपितु वह समस्त पदार्थों का प्रकाश करनेवाला है । इस प्रकार सरस्वती के तेज को मैं मस्तक झुका कर नमस्कार करता हूँ अर्थात् माँ सरस्वती का आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला तेज मेरी रक्षा करे ।