
तव स्तवे यत्कविरस्मि साम्प्रतं,
भवत्प्रसादादपि लब्धपाटव: ।
सवित्रि! गंगासरितेऽर्घदायको,
भवामि तत्तज्जलपूरितांजलि: ॥3॥
तव प्रसाद से कवि हुआ मैं, तेरी स्तुति करने योग्य ।
गंगा-जल से अंजलि भरकर, अर्घ्य समर्पित गंगा को॥
अन्वयार्थ : हे सरस्वती माता! आपकी कृपा से प्राप्त इस चातुर्य के द्वारा मैं आपकी स्तुति करने के लिए ही कवि हुआ हूँ । इससे ऐसा प्रतीत होता है कि गंगा नदी के जल से अंजलि भर कर, मैं गंगा नदी को ही अर्घ्य दे रहा हूँ ।