+ उपसंहार : सुप्रभाताष्टक स्तोत्र पढने का फल -
भव्याऽम्भोरुह-नन्दि-केवल-रवि:, प्राप्नोति यत्रोदयं;
दुष्कर्मोदय-निद्रया परिहृतं, जागर्ति सर्वं जगत् ।
नित्यं यै: परि-पठ्यते जिनपतेरेतत्प्रभाताऽष्टकं;
तेषामाशु विनाशमेति दुरितं, धर्म: सुखं वर्धते ॥8॥
भव्य-कमल को विकसित करता, केवल-रवि का जहाँ उदय ।
पापोदय से जनित नींद से मुक्त जगत् के जीव प्रबुद्ध॥
भव्य जीव जो पढ़ें निरन्तर, जिनपति का अष्टक सुप्रभात ।
धर्म और सुख में वृद्धि हो, पापों का भी होता नाश॥
यहाँ श्री जिनेन्द्रदेव के सुप्रभात में, भव्य-कमलों को
अन्वयार्थ : आनन्द देनेवाला केवलज्ञानरूपी सूर्य का उदय होता है तथा समस्त जगत् खोटे कर्मों से उत्पन्न निद्रा को त्यागकर प्रबोधावस्था को प्राप्त होता है - ऐसे उत्तम सुप्रभाताष्टक को, जो भव्य जीव नित्य पढ़ते हैं, उनके समस्त पापों का नाश होकर धर्मवृद्धि होती है, सुख की वृद्धि होती है ।