
यद्भानोरपि गोचरं न गतवान्, चित्ते स्थितं तत्तमो;
भव्यानां दलयत्तथा कुवलये, कुर्याद्विकाशश्रियम् ।
तेज: सौख्यहतेरकर्तृ यदिदं, नक्तंचराणामपि;
क्षें वो विदधातु जैनमसमं, श्रीसुप्रभातं सदा ॥7॥
रवि-अगम्य जो भव्य चित्त में, व्याप्त-तिमिर का करता नाश ।
सर्व प्राणियों को हर्षित कर, भूमण्डल में करे विकास॥
किन्तु निशाचर जीवों के वह, तेज और सुख करे न नष्ट ।
जन-जन का कल्याण करे यह, जिनवर का अनुपम सुप्रभात॥
अन्वयार्थ : जो सूर्य-गोचर नहीं है - ऐसे भव्य जीवों के चित्त में विद्यमान अन्धकार को नष्ट करनेवाला जिनेन्द्रदेव का सुप्रभात, भूण्डल पर अत्यन्त शोभा को धारण करता है तथा रात्रि में गमन करनेवाले जीवों के तेज व सुख का नाश नहीं करता है - ऐसा समीचीन तथा उपमारहित जिनेन्द्र भगवान का सुप्रभात सदैव हमारा कल्याण करे ।