+ पुष्पवृष्टि प्रातिहार्य का वर्णन -
गन्धाकृष्ट-मधु-व्रत-व्रज-रुतै:, व्यापारिता कुर्वती;
स्तोत्राणीव दिव: सुरै: सुनसां, वृष्टिर्यदग्रेऽभवत् ।
सेवायात-समस्त-विष्टप-पति-,स्तुत्याश्रय-स्पर्धया;
सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपति:, श्रीशान्तिनाथ: सदा ॥4॥
प्रभु के सन्मुख नभ में देवों, द्वारा हुई पुष्प-वृष्टि ।
मानो सुरपति द्वारा स्तुति, से ईर्ष्या उत्पन्न हुई॥
अत: गन्ध से आकर्षित, भ्रमरों ने मधु-गुंजार किया ।
पापरहित श्री शान्तिनाथ! हम सबकी रक्षा करें सदा॥
अन्वयार्थ : श्री शान्तिनाथ भगवान के सम्मुख देवों द्वारा आकाश में पुष्पवर्षा करने पर उन पुष्पों की सुगन्ध से आकर्षित होकर, भ्रमरों का समूह भी आकर, गुंजार करने लगता है, उससे ऐसा लगता है, मानो आपकी सेवा में आए हुए समस्त लोक के स्वामी देवेन्द्रादिक की स्तुति से उत्पन्न हुई ईर्ष्या के कारण सुगन्ध से खींचे हुए भ्ररों का समूह भी अपने गुंजार से स्तोत्रों को ही कर रहा हो । इस प्रकार समस्त पापों से रहित श्री शान्तिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें ।