
खद्योतौ किमुतानलस्य कणिके, शुभ्राभ्रलेशावथ;
सूर्याचन्द्रमसाविति प्रगुणितौ, लोकाक्षि-युग्मै: सुरै: ।
तर्क्येते हि यदग्रतोऽतिविशदं, तद्यस्य भामण्डलं;
सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपति:, श्रीशान्तिनाथ सदा ॥5॥
सुरगण अरु मनुजों के नेत्र-युगल में रवि-शशि भासित हों ।
जुगनू जैसे या अग्निकण, या मेघों के टुकड़े हों॥
जिसके सन्मुख कान्तिमान जो, जिनवर का भामण्डल था ।
पापरहित श्री शान्तिनाथ! हम सबकी रक्षा करें सदा॥
अन्वयार्थ : हे शान्तिनाथ भगवान! आपके भामण्डल की प्रभा के आगे देव तथा मनुजों के नेत्र, सूर्य एवं चन्द्रमा को दो खद्योत के समान अथवा अग्नि के दो स्फुलिंग के समान अथवा सफेद मेघ के दो टुकड़ों के समान मानते हैं - ऐसे भामण्डल प्रातिहार्य से शोभित, समस्त पापों से रहित श्री शान्तिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें ।