+ अशोकवृक्ष प्रातिहार्य का वर्णन -
यस्याऽशोक-तरुर्विनिद्र-सुनो-, गुच्छ-प्रसक्तै: क्वणद्-;
भृंगैर्भक्ति-युत: प्रभोरहरहर्गायन्निवाऽऽस्ते यश: ।
शुभ्रं साऽभिनयो मरुच्चल-लता-,पर्यन्त-पाणि-श्रिया;
सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपति:, श्रीशान्तिनाथ: सदा ॥6॥
खिले हुए फूलों पर बैठे, भ्रमर करें निश-दिन गुंजार ।
मानो तरु अशोक भक्ति से, करता हो प्रभु का यशगान॥
हिलती लतारूप हाथों से, मानो वह तरु नाच रहा ।
पापरहित श्री शान्तिनाथ! हम सबकी रक्षा करें सदा॥
अन्वयार्थ : हे शान्तिनाथ भगवान! ऐसा लगता है कि मानो आपके प्रति अत्यन्त भक्तिसहित अशोक वृक्ष ही खिले हुए पुष्प-गुच्छों पर बैठे, गुँजार करते हुए भ्ररों के माध्यम से प्रभु के निर्मल यश का गुनगान कर रहा हो तथा पवन से कम्पित लताओं के अग्र भागरूपी हाथों से वही अशोकवृक्ष, नृत्य करता हुआ जान पड़ता है - ऐसे समस्त पापों से रहित श्री शान्तिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें ।