+ श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्र को नमस्कार करते हुए तीन छत्ररूप प्रातिहार्य का वर्णन -
(शार्द्रूलविक्रीडित)
त्रैलोक्याऽधिपतित्व-सूचन-परं, लोकेश्वरैरुद्धृतं;
यस्योपर्युपरीन्दु-मण्डल-निभं, छत्र-त्रयं राजते ।
अश्रान्तोद्गत-केवलोज्ज्वल-रुचा, निर्भर्त्सिताऽर्क-प्रभं;
सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपति:, श्रीशान्तिनाथ: सदा ॥1॥
जिनके मस्तक पर सुरगण से, आरोपित शशिबिम्ब समान ।
छत्रत्रय शोभित जो घोषित, करते प्रभु! त्रिभुवन के नाथ॥
सदा उदित कैवल्य-कान्ति से, फीकी पड़ती सूर्यप्रभा ।
पापरहित श्री शान्तिनाथ! हम सबकी रक्षा करें सदा॥
अन्वयार्थ : श्री शान्तिनाथ भगवान के मस्तक पर, तीन लोक का स्वामीपना प्रकट करने के लिए देवेन्द्रों द्वारा पूजित तथा चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब-समान तीन छत्र शोभित होते हैं । निरन्तर उदय को प्राप्त केवलज्ञान की निर्मल कान्ति से जिन्होंने सूर्य की प्रभा को भी तिरस्कृत कर दिया है तथा जो समस्त पापों से रहित हैं - ऐसे श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्र! सदैव हमारी रक्षा करें ।