+ दुन्दुभि प्रातिहार्य का वर्णन -
देव: सर्वविदेष एव परमो, नाऽन्यस्त्रिलोकी-पति:;
सन्त्यस्यैव समस्त-तत्त्व-विषया, वाच: सतां सम्मता: ।
एतद्घोषयतीव यस्य विबुधैरास्फालितो दुन्दुभि:;
सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपति:, श्रीशान्तिनाथ: सदा ॥2॥
देव यही सर्वज्ञ परम, त्रैलोक्य-पति हैं अन्य नहीं ।
सकल तत्त्व प्रतिपादक वाणी, सज्जन को सम्मत इनकी॥
जग में जिनकी देव-दुन्दुभी, यही घोषणा करे सदा ।
पापरहित श्री शान्तिनाथ! हम सबकी रक्षा करें सदा॥
अन्वयार्थ : देवताओं द्वारा ताड़ित (बजाई हुई) श्री शान्तिनाथ भगवान की दुन्दुभि (नगाड़ा), समस्त संसार में इस बात को प्रकट कर रहा है कि समस्त पदार्थों को प्रत्यक्ष जाननेवाले, उत्कृष्ट और तीन लोक के पति यदि कोई हैं तो वे श्री शान्तिनाथ भगवान ही हैं; किन्तु इनसे भिन्न न कोई समस्त पदार्थों का जाननेवाला है, न उत्कृष्ट है और न तीन लोक का स्वामी है । समस्त तत्त्वों का वर्णन करनेवाले इन्हीं भगवान के वचन, सज्जनों को सम्मत हैं; इनसे भिन्न किसी के वचन सम्मत नहीं हैं - ऐसे समस्त कर्मों से रहित दुन्दुभि प्रातिहार्य से शोभित श्री शान्तिनाथ भगवान, सदैव हमारी रक्षा करें । (इस पद्य में उत्प्रेक्षा अलंकार है)