+ सिंहासन प्रातिहार्य का वर्णन -
दिव्य-स्त्री-मुख-पंकजैक-मुकर-प्रोल्लासि-नाना-
मणिस्फारीभूत-विचित्र-रश्मि-रचिता,-नम्राऽमरेन्द्रायुधै: ।
सच्चित्रीकृत-वात-वर्त्मनि लसत्, सिंहासने य: स्थित:;
सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपति:, श्रीशान्तिनाथ: सदा ॥3॥
सुर-वनिताओं के मुखरूपी, दर्पण में मणि चमक रही ।
विविध रंग की किरणों से वे, इन्द्रधनुष रचना करती॥
अद्भुत अनुपम सिंहासन की, नभ में है विचित्र शोभा ।
पापरहित श्री शान्तिनाथ! हम सबकी रक्षा करें सदा॥
अन्वयार्थ : स्वर्ग की देवांगनाओं के मुख-कमलरूपी दर्पण से दैदीप्यमान, नाना प्रकार के रत्नों से युक्त तथा इन्द्रधनुष के समान आकाश में चारों ओर फैले हुए रत्न-किरणों से चित्र-विचित्र - ऐसे दैदीप्यमान सिंहासन पर विराजमान, समस्त पापों से रहित श्री शान्तिनाथ भगवान, सदा हमारी रक्षा करें । (इस पद्य में भी उत्प्रेक्षा अलंकार है)