+ श्री शान्तिनाथ स्तोत्र का उपसंहार -
नि:शेष-श्रुत-बोध-वृद्ध-मतिभि:, प्राज्यैरुदारैरपि;
स्तोत्रैर्यस्य गुणाऽर्णवस्य हरिभि:, पारो न सम्प्राप्यते ।
भव्याऽम्भोरुह-नन्दि-केवल-रवि:, भक्त्या मयापि स्तुत:;
सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपति:, श्रीशान्तिनाथ: सदा ॥9॥
सकल शास्त्र के ज्ञाता जिनकी, बुद्धि है अत्यन्त विशाल ।
सुरपति स्तुति करके गुणसागर, का नहिं पावें हैं पार॥
केवलज्ञान-सूर्य भवि-कमलों को नित विकसित करता ।
पापरहित श्री शान्तिनाथ! हम सबकी रक्षा करें सदा॥
अन्वयार्थ : समस्त शास्त्रों के ज्ञान से जिनकी बुद्धियाँ अत्यन्त विशाल है - ऐसे इन्द्रादि देव अपने उत्कृष्ट तथा बड़े-बड़े स्तोत्रों से जिन श्री शान्तिनाथ भगवान के गुणरूपी समुद्र का पार नहीं पा सकते, उन केवलज्ञानरूपी सूर्य के धारक श्री शान्तिनाथ भगवान की आनन्दित होकर, मुझ भव्यरूपी कमल अर्थात् पद्मनन्दि ने स्तुति की है; इसलिए समस्त पापों से रहित वे श्री शान्तिनाथ भगवान सदैव हमारी रक्षा करें । (इस पद्य में रूपक अलंकार है)