
अर्हन् समाश्रित-समस्त-नराऽमरादि-,
भव्याऽब्ज-नन्दि-वचनांशु-रवेस्तवाग्रे ।
मौखर्यमेतदबुधेन मया कृतं यत्,
तद्भूरिभक्ति-रभस-स्थित-मानसेन ॥18॥
आश्रित नर-सुर कमल विकासी, वचन किरण स्वामी जिनसूर्य ।
गाढ़ भक्ति में डूबे मन से, तव सन्मुख मैं हुआ मुखर॥
अन्वयार्थ : हे अर्हन्! यद्यपि आप सभा में बैठे हुए, मनुष्य तथा देवादि समस्त भव्य जीव रूपी कमलों को आनन्द देनेवाले सूर्य के समान वचनरूपी किरणों के स्वामी हो; तथापि आपके सामने मुझ जैसे अपण्डित ने जो वाचालता प्रकट की है, वह अत्यन्त गाढ़ भक्ति में स्थित मन से ही की है ।