
जिनेश्वर! नमोऽस्तु ते, त्रिभुवनैकचूडामणे;
गतोऽस्मि शरणं विभो, भवभिया भवन्तं प्रति ।
तदाहतिकृते बुधैरकथि तत्त्वमेतन्मया;
श्रितं सुदृढचेतसा, भवहरस्त्वमेवात्र यत् ॥17॥
हे त्रिलोक के चूड़ामणि जिनराज! तुम्हें मेरा वन्दन ।
मैं भव से भयभीत हुआ हूँ, अत: आपकी गही शरण॥
बुधजन भाषित तत्त्व जगत् की, भवपीड़ा का करे विनाश ।
सुदृढ़ मन से लिया आश्रय, क्योंकि आपसे ही भवनाश॥
अन्वयार्थ : हे त्रिभुवन के चूड़ामणि जिनेन्द्र भगवान! आपको नमस्कार हो । संसार से भयभीत होकर, मैं आपकी शरण में आया हूँ । विद्वान् लोगों ने संसार की पीड़ा को नाश करने के लिए जो तत्त्व कहा है, उसका मैंने दृढ़ चित्त से आश्रय कर, अपने अन्तरंग में उसे धारण किया है क्योंकि समस्त संसार में आप ही संसार का नाश करनेवाले हो ।