+ एकत्वस्वरूपी आत्मा को जानने पर अन्य लोगों द्वारा पूजा-आराधना -
एकत्वैक-पद-प्राप्तमात्म-तत्त्वमऽवैति य: ।
आराध्यते स एवाऽन्यै:, तस्याराध्यो न विद्यते ॥2॥
एकत्वमय निज आत्मा को, जानते जो भव्य जन ।
उनकी करें पूजा सभी, उनका न कोई पूज्य है॥
अन्वयार्थ : जो भव्य जीव, एकत्वस्वरूप को प्राप्त आत्मतत्त्व को जानते हैं, उस पुरुष की पूजा-आराधना अन्य सभी लोग भी करते हैं; किन्तु उसका आराध्य कोई नहीं होता अर्थात् वह किसी को नहीं पूजता ।