+ एकत्वस्वरूप को जानने पर कर्म-बन्धन से निर्भयपना -
एकत्वज्ञो बहुभ्योऽपि, कर्मभ्यो न बिभेति स: ।
योगी सुनौगतोऽम्भोधि-,जलेभ्य इव धीरधी: ॥3॥
नाव में बैठा सुधी, डरता न सागर-नीर से ।
एकत्व ज्ञाता भी कभी, डरता न कर्म-समूह से॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार धीर बुद्धि पुरुष, उत्तम नाव में बैठ कर, समुद्र के जल से भय नहीं करते; उसी प्रकार एकत्वस्वरूप को जाननेवाले योगी, कर्मों से अंशमात्र भी भय नहीं करते हैं ।