+ उपसंहार में ग्रन्थकार द्वारा अवाच्य तत्त्व की प्राप्ति हेतु मौन-धारण -
तत्त्वं वागतिवर्ति शुद्धनयतो, यत्सर्व-पक्ष-च्युतं;
तद्वाच्यं व्यवहार-मार्ग-पतितं, शिष्यार्पणे जायते ।
प्रागल्भ्यं न तथापि तत्र विवृतौ, बोधो न तादृग्विध:;
तेनाऽयं ननु मादृशो जडमति:, मौनाश्रितस्तिष्ठति ॥20॥
निश्चय से यह वचन-अगोचर तत्त्व सदा नयपक्ष-विहीन ।
शिष्यों को सम्बोधन हेतु, नय-व्यवहार कहे कथनीय॥
किन्तु नहीं परिपक्व और, कहने लायक नहिं मुझमें ज्ञान ।
इसीलिए मुझ जैसा जड़मति, धारण कर लेता है मौन॥
अन्वयार्थ : शुद्धनिश्चयनय से तत्त्व वचन के अगोचर है तथा समस्त प्रकार के पक्षों (अपेक्षाओं) से रहित है । व्यवहारमार्ग में आया हुआ तत्त्व, शिष्यों के बोध के लिए वाच्य (वचन के द्वारा कहने योग्य) होता है तो भी ग्रन्थकार कहते हैं कि उस तत्त्व के व्याख्यान को करने की मुझमें भलीभाँति प्रौढ़ता भी नहीं है और उसके वर्णन करने योग्य ज्ञान भी नहीं है; अत: मेरे समान जड़बुद्धि पुरुष, मौन को ही धारण करता है ।