
जायन्ते विरसा रसा विघटते, गोष्ठी-कथा-कौतुकं;
शीर्यन्ते विषयास्तथा विरमति, प्रीति: शरीरेऽपि च ।
जोषं वागपि धारयत्यविरतानन्दात्म-शुद्धात्मन:;
चिन्तायामपि यातुमिच्छति समं, दोर्षैन: पञ्चताम् ॥19॥
सारे रस नीरस हो जाते, गोष्ठी-कथा-कुतूहल नष्ट ।
विष-सम विषय-विकार और, तन से भी होती प्रीति विनष्ट॥
मन के सारे दोष नष्ट हों, वाणी का भी रुके विलास ।
नित्यानन्द स्वरूप आत्म में, जब होती अनुभूति सुवास॥
अन्वयार्थ : आनन्दस्वरूप शुद्धात्मा का चिन्तवन होने पर समस्त रस नीरस हो जाते हैं, गोष्ठी में कथा-कौतूहल नष्ट हो जाता है, समस्त विषय नष्ट हो जाते हैं, शरीर में अंशमात्र भी प्रीति नहीं रहती और वाणी भी जोष को धारण कर लेती है अर्थात् उसे मौन का अवलम्बन करना पड़ता है तथा समस्त दोषों के साथ मन भी नष्ट हो जाता है ।