
दुर्गन्धं कृमि-कीट-जाल-कलितं, नित्यं स्रवद्-दूरसं;
शौच-स्नान-विधान-वारि-विहित-, प्रक्षालनं रुग्भृतम् ।
मानुष्यं वपुराहुरुन्नत-धियो, नाडी-व्रणं भेषजं;
तत्राऽन्नं वसनानि पट्टकमहो, तत्राऽपि रागी जन: ॥2॥
रक्त-पीप नित बहें और दुर्गन्धित कृमि-कीटों से व्याप्त ।
शुचि जल से धोते हैं इसको, किन्तु रहे रोगों से व्याप्त॥
बुद्धिमान् तो इस नरतन को कहते हैं नाड़ी-व्रण-घाव ।
अन्न-औषधि वस्त्र-पट्टी सम, किन्तु मूढ़जन करते राग॥
अन्वयार्थ : अत्यन्त दुर्गन्धमय लट एवं कीड़ों के समूह से व्याप्त, जिसमें निरन्तर रक्त, पीव आदि बह रहे हैं, जिसका प्रक्षालन पवित्र जल से किया जाता है, फिर भी जो नाना प्रकार के रोगों से व्याप्त है - ऐसे मनुष्य के शरीर को उच्च बुद्धि के धारक मनुष्य, नाड़ी-व्रण कहते हैं । जिसके निराकरण के लिए अन्नरूपी औषधि प्रदान की जाती है और वस्त्ररूपी पट्टी बाँधी जाती है तो भी आश्चर्य है कि ऐसे निकृष्ट शरीर में भी जीव, राग करता है ।