
नृणामशेषाणि सदैव सर्वथा, वपूंषि सर्वाऽशुचिभांजि निश्चितम् ।
तत: क एतेषु बुध: प्रपद्यते, शुचित्वमम्बुप्लुति-चन्दनादिभि:॥3॥
सबके तन हैं मलिन सर्वथा, सदा सुनिश्चित भली प्रकार ।
स्नानादिक से शुचि करने का, कौन सुबुध फिर करे विचार ?
अन्वयार्थ : समस्त मनुष्यों के शरीर, सदा काल सब प्रकार से अपवित्र ही हैं - ऐसा भलीभाँति निश्चित है, इसलिए संसार में कौन ऐसा बुद्धिमान् पुरुष होगा, जो इस शरीर को स्नान तथा चन्दनादि से पवित्र करने का प्रयत्न करेगा?