+ उपसंहार में काल की आज्ञाकारिणी दासी वृद्धावस्था का चित्रण -
रक्षा-पोषविधौ जनोऽस्य वपुष:, सर्व: सदैवोद्यत:;
कालादिष्ट-जरा करोत्यनुदिनं, तज्जर्जरं चाऽनयो: ।
स्पर्द्धााश्रितयोर्द्वयोर्विजयनी, सैका जरा जायते;
साक्षात्कालपुरस्सरा यदि तदा, कास्था स्थिरत्वे नृणाम् ॥8॥
इस तन के रक्षण-पोषण में, जब जन सदा लगे रहते ।
आज्ञा मान काल की, वृद्धावस्था इसको क्षीण करे॥
जन्म-मरण के मध्य बुढ़ापा, जिसके सन्मुख काल खड़ा ।
तो फिर तन की स्थिरता का, कहो भरोसा हो सकता ?
अन्वयार्थ : यह मनुष्य, शरीर की रक्षा तथा पोषण करने में ही सदा लगा रहता है, परन्तु काल की आज्ञाकारिणी दासी यह वृद्धावस्था, सदैव उस शरीर को जर्जरित अर्थात् छिन्न-भिन्न करती रहती है । वास्तव में परस्पर ईर्ष्या या द्वेष करनेवाले जन्म-मरण के मध्य में यदि सबको जीतनेवाली वृद्धावस्था और उसके बाद काल (मृत्यु) विद्यमान है तो क्या 'यह शरीर, सदाकाल रहेगा?' - ऐसा विश्वास करना, मनुष्यों को उचित है?