
संसारस्तनुयोग एष विषयो, दु:खाऽन्यतो देहिनो;
वह्नेर्लोह-समाश्रितस्य घनतो, घातो यथा निष्ठुरात् ।
त्याज्या तेन तनुर्मुमुक्षुभिरियं, युक्त्या महत्या तया;
नो भूयोऽपि यथात्मनो भवकृते, तत्सन्निधिर्जायते ॥7॥
जैसे लौह-संग से अग्नि, कठिन घनों के घात सहे ।
इस तन की संगति से जग में, जीव अनेकों दु:ख भोगे॥
अत: महान् युक्ति से भव्य, मुमुक्षु तजें इस तन का संग ।
जिससे पुन: न हो चेतन को, भवदु:खदायक तन-सम्बन्ध॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार लोहे के आश्रित अग्नि को अत्यन्त कठोर घन से घात सहनी पड़ती है; उसी प्रकार शरीर-सम्बन्ध से यह संसार उत्पन्न होता है और जीवों को संसार में नाना प्रकार के दु:ख भोगने पड़ते हैं; इसलिए जो भव्य जीव मुमुक्षु हैं हैं, उनको ऐसी किसी बड़ी भारी युक्ति के साथ इस शरीर का त्याग कर देना चाहिए कि जिससे इस आत्मा को संसार-परिभ्रण के कारणभूत इस शरीर का सम्बन्ध ही न होवे ।