+ मंगलाचरण में भववर्द्धक अत्यन्त दु:खदायी मैथुन-सेवन का निषेध -
(द्रुतविलम्बित)
भव-विवर्धनमेव यतो भवेत्;
अधिक-दु:खकरं चिरमङ्गिनाम् ।
इति निजाङ्गनयाऽपि न तन्मतं;
मतिमतां सुरतं किमतोऽन्यथा ॥1॥
निज-वनिता से भी रति जीवों,को भववर्द्धक दु:खदायक ।
अत: सत्पुरुष उचित न मानें, तो पर-नारी किस लायक ?
अन्वयार्थ : मैथुन-सेवन से संसार की ही वृद्धि होती है तथा यह मैथुन, समस्त जीवों को अत्यन्त दु:ख देने वाला है; इसलिए सज्जन पुरुषों ने अपनी स्त्री के साथ भी इसका सेवन उचित नहीं माना है तो फिर दूसरी स्त्रियों या अन्य प्रकार से उसे अच्छा कैसे कहेंगे?