+ गुण-दोषों को विचारने वाले बुद्धिमानों की दृष्टि में मैथुन हीे पशुकर्म -
पशव एव रते रत-मानसा;
इति बुधै: पशुकर्म तदुच्यते ।
अभिधया ननु सार्थकयाऽनया;
पशुगति: पुरतोऽस्य फलं भवेत् ॥2॥
कामातुर नर पशु है क्योंकि, बुध रति को पशुकर्म कहें ।
मैथुन से पशुगति ही होती, अत: नाम 'पशु' ठीक कहें॥
जो मनुष्य, मैथुन-सेवन के अत्यन्त अभिलाषी हैं, वे साक्षात् पशु ही हैं
अन्वयार्थ : क्योंकि वास्तविक रीति से पदार्थों के गुण-दोषों को विचारने वाले बुद्धिमान पुरुषों ने इस मैथुन को पशुकर्म ही कहा है, जो सर्वथा ठीक प्रतीत होता है क्योंकि मैथुन करने वाले मनुष्यों को मैथुनकर्म से पशुगति ही मिलती है ।