+ उपसंहार में ब्रह्मचर्याष्टक से भोगियों को होने वाले दु:ख हेतु क्षमा -
युवति-संगति-वर्जनमष्टकं; प्रति मुमुक्षुजनं भणितं मया ।
सुरत-राग-समुद्र-गता जना:, कुरुत मा क्रुधमत्र मुनौ मयि ॥9॥
नारी-संग-निषेधक अष्टक, मुमुक्षु, हेतु रचा मैंने ।
रागोदधि में डूबे जो नर, मुझे जान मुनि क्षमा करें॥
जो मनुष्य, मुमुक्षु अर्थात् मोक्ष-प्राप्ति के अभिलाषी हैं, उन मनुष्यों के लिए
अन्वयार्थ : मैंने युवती स्त्रियों के संग को निषेध करने वाले इस अष्टक का अर्थात् ब्रह्मचर्याष्टक का वर्णन किया है; किन्तु जो मनुष्य, भोगरूपी राग-समुद्र में डूबे हुए हैं, वे इस अष्टक को अच्छा नहीं समझते; अत: वे मुझे मुनि समझ कर क्षमा करें ।