
रति-निषेध-विधौ यततां भवेत्; चपलतां प्रविहाय मन: सदा ।
विषयसौख्यमिदं विषसन्निभं; कुशलमस्ति न भुक्तवतस्तव ॥8॥
रे मन! छोड़ चपलता, मैथुन तजने का तू कर पुरुषार्थ ।
विषयों का सुख विष है जिसका, भक्षण नहीं कभी हितकार॥
जो मनुष्य, अपना हित चाहते हैं, उनको अपने मन
अन्वयार्थ : को अच्छी तरह शिक्षा देनी चाहिए कि हे मन! तू सदैव चपलता को छोड़ कर, रति के निषेध करने में प्रयत्न कर क्योंकि यह विषय सौख्य-विषभक्षण करने के समान है; अत: इस विषय सुख को भोगते हुए तेरी कुछ भी कुशल नहीं है ।