
ण वि इंदियकरणजुदा, अवग्गहादीहि गाहया अत्थे।
णेव य इंदियसोक्खा, अणिंदियाणंतणाणसुहा॥174॥
अन्वयार्थ : जो जीव नियम से इन्द्रियों के करण भौहें टिमकारना आदि व्यापार, उनसे संयुक्त नहीं है, इसलिये ही अवग्रहादिक क्षयोपशम ज्ञान से पदार्थ का ग्रहण नहीं करते। तथा इन्द्रियजनित विषय-संबंध से उत्पन्न सुख उससे संयुक्त नहीं हैं वे अर्हंत और सिद्ध अतीन्द्रिय अनंत ज्ञान और अतीन्द्रिय अनंत सुख से विराजमान जानना। क्योंकि उनका ज्ञान और सुख शुद्धात्मतत्त्व की उपलब्धि से उत्पन्न हुआ है ॥174॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका