
मणवयणाणं मूलणिमित्तं खलु पुराणदेहउदओ दु।
मोसुभयाणं मूलणिमित्तं खलु होदि आवरणं॥227॥
अन्वयार्थ : सत्य और अनुभय मनोयोग तथा वचनयोग मूल कारण पर्याप्ति और शरीर नामकर्म का उदय है। मृषा और उभय मनोयोग तथा वचनयोग का मूल कारण अपना-अपना आवरण कर्म है ॥227॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका