जीवतत्त्वप्रदीपिका
मणसहियाणं वयणं, दिट्ठं तप्पुव्वमिदि सजोगम्हि।
उत्तो मणोवयारेणिंदियणाणेण हीणम्हि॥228॥
अन्वयार्थ :
हम आदिक छद्मस्थ मनसहित जीवों के वचनप्रयोग मनपूर्वक ही होता है। इसलिये इन्द्रियज्ञान से रहित सयोगकेवली के भी उपचार से मन कहा है ॥228॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका