
बादरतेऊवाऊ, पंचिंदियपुण्णगा विगुव्वंति।
ओरालियं शरीरं, विगुव्वणप्पं हवे जेसिं॥233॥
अन्वयार्थ : बादर तेजस्कायिक और वायुकायिक तथा संज्ञी पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च एवं मनुष्य तथा भोगभूमिज तिर्यक्, मनुष्य अपने-अपने औदारिक शरीर को विक्रियारूप परिणमातेहैं ॥233॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका