आहारयमुत्तत्थं, विजाण मिस्सं तु अपरिपुण्णं तं।
जो तेण संपजोगो, आहारयमिस्सजोगो सो॥240॥
अन्वयार्थ : आहारक शरीर का अर्थ ऊपर बताया जा चुका है। जब तक वह पर्याप्त नहीं होता तब तक उसको आहारकमिश्र कहते हैं और उसके द्वारा होने वाले योग को आहारकमिश्रकाययोग कहते हैं ॥240॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका