
वेगुव्वियवरसंचं, बावीससमुद्दआरणदुगम्हि।
जम्हा वरजोगस्स य, वारा अण्णत्थ ण हि बहुगा॥257॥
अन्वयार्थ : वैक्रियिक शरीर का उत्कृष्ट संचय, बाईस सागर की आयु वाले आरण और अच्युत स्वर्ग के ऊपरी पटल संबंधी देवों के ही होता है,्नयोंकि वैक्रियिक शरीर का उत्कृष्ट योग तथा उसके योग्य दसरी सामग्रियाँ अन्यत्र अनेक बार नहीं होती ॥257॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका