तेजासरीरजेट्ठं, सत्तमचरिमम्हि विदियवारस्स।
कम्मस्स वि तत्थेव य, णिरये बहुवारभमिदस्स॥258॥
अन्वयार्थ : तैजस शरीर का उत्कृष्ट संचय सप्तम पृथिवी में दसरी बार उत्पन्न होने वाले जीव के होता है और कार्मण शरीर का उत्कृष्ट संचय अनेक बार नरकों में भ्रमण करके सप्तम पृथिवी में उत्पन्न होनेवाले जीव के होता है। आहारक शरीर का उत्कृष्ट संचय प्रमत्तविरत के औदारिक शरीरवत् अंत समय में होता है ॥258॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका