
वेदस्सुदीरणाए, परिणामस्स य हवेज्ज संमोहो।
संमोहेण ण जाणदि, जीवो हि गुणं व दोषं वा॥272॥
अन्वयार्थ : वेद नोकषाय के उदय तथा उदीरणा होने से जीव के परिणामों में बड़ा भारी मोह उत्पन्न होता है और इस संमोह के होने से यह जीव गुण अथवा दोष को नहीं जानता ॥272॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका