वेणुवमूलोरब्भयसिंगे गोमुत्तए य खोरप्पे।
सरिसी माया णारयतिरियणरामरगईसु खिवदि जियं॥286॥
अन्वयार्थ : बाँस की जड़, मेढ़े के सींग, गोमूत्र तथा खुरपा के समान उत्कृष्ट आदि शक्ति से युक्त माया जीव को यथाक्रम नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति में उत्पन्न कराती हैं॥286॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका