किमिरायचक्कतणुमलहरिद्दराएण सरिसओ लोहो।
णारयतिर्निखमाणुसदेवेसुप्पायओ कमसो॥287॥
अन्वयार्थ : कृमिराग, चक्रमल, शरीरमल और हल्दी के रंग के समान उत्कृष्ट आदि शक्ति से युक्त विषयों की अभिलाषारूप लोभ कषाय क्रम से जीव को नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति में उत्पन्न कराती हैं॥287॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका