
सेलगकिण्हे सुण्णं, णिरयं च य भूगएगविट्ठाणे।
णिरयं इगिवितिआऊ तिट्ठाणे चारि सेसपदे॥293॥
अन्वयार्थ : शैलगत कृष्णलेश्या में कुछ स्थान तो ऐसे हैं कि जहाँ पर आयुबंध नहीं होता। इसके अनन्तर कुछ स्थान ऐसे हैं कि जिनमें नरक आयु का बंध होता है। इसके बाद पृथ्वीभेदगत पहले और दूसरे स्थान में नरक आयु का ही बंध होता है। इसके भी बाद कृष्ण, नील, कापोत लेश्या के तीसरे भेद में कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ नरक आयु का ही बंध होता है और कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ पर नरक, तिर्यंच दो आयु का बंध हो सकता है तथा कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ पर नरक, तिर्यंच तथा मनुष्य तीनों ही आयु का बंध हो सकता है। शेष के तीन स्थानों में चारों आयु का बंध हो सकता है॥293॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका