सुण्णं दुगइगिठाणे, जलम्हि सुण्णं असंखभजिदकमा।
चउचोदसवीसपदा, असंखलोगा हु पत्तेयं॥295॥
अन्वयार्थ : इसी के (धूलिभेदगत के ही) पद्म और शुक्ललेश्या वाले पाँचवें स्थान में और केवल शुक्ललेश्या वाले छठे स्थान में आयु का अबंध है तथा जलभेदगत केवल शुक्ललेश्यावाले एक स्थान में भी आयु का अबंध है। इसप्रकार कषायों के शक्ति की अपेक्षा चार भेद, लेश्याओं की अपेक्षा चौदह भेद, आयु के बंधाबंध की अपेक्षा बीस भेद होते हैं। इनमें प्रत्येक के अवान्तर भेद असंख्यात लोकप्रमाण हैं तथा अपने-अपने उत्कृष्ट से अपने-अपने जघन्य पर्यन्त क्रम से असंख्यातगुणे-असंख्यातगुणे हीन हैं॥295॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका