णरतिरिय लोहमायाकोहो माणो विइंदियादिव्व।
आवलिअसंखभज्जा, सगकालं वा समासेज्ज॥298॥
अन्वयार्थ : मनुष्य-तिर्यंचों में लोभ, माया, क्रोध और मानवाले जीवों की संख्या जिस प्रकार इन्द्रियमार्गणा में द्वीन्द्रियादि जीवों की संख्या आवली के असंख्यातवें भाग का भाग दे-देकर मबहुभागे समभागेङ्क इत्यादि गाथा द्वारा निकाली थी, उसी प्रकार यहाँ भी निकालना चाहिये। अथवा अपने-अपने काल की अपेक्षा से उक्त कषायवाले जीवों का प्रमाण निकालना चाहिये॥298॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका