विसजंतकूडपंजरबंधादिसु विणुवएसकरणेण।
जा खलु पवट्टइ मई, मइअण्णाणं ति णं बेंति॥303॥
अन्वयार्थ : दूसरे के उपदेश के बिना ही विष यन्त्र कूट पिंजर तथा बंध आदिक के विषय में जो बुद्धि प्रवृत्त होती है उसको मत्यज्ञान कहते हैं ॥303॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका