
पुक्खरगहणे काले, हत्थिस्स य वदणगवयगहणे वा।
वत्थुंतरचंदस्स य, धेणुस्स य बोहणं च हवे॥313॥
अन्वयार्थ : जल में डूबे हुए हस्ती की सूंड को देखकर उसी समय में जलमग्न हस्ती का ज्ञान होना, अथवा मुख को देखकर उस ही समय उससे भिन्न किन्तु उसके सदृश चन्द्रमा का ज्ञान होना, अथवा गवय को देखकर उसके सदृश गौ का ज्ञान होना। इनको अनि:सृत ज्ञान कहते हैं ॥313॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका