एक्कचउक्कं चउ वीसट्ठावीसं च तिप्पडिं किच्चा।
इगिछव्वारसगुणि दे, मदिणाणे होंति ठाणाणि॥314॥
अन्वयार्थ : मतिज्ञान सामान्य की अपेक्षा एक भेद, अवग्रह ईहा अवाय धारणा की अपेक्षा चार भेद, पाँच इन्द्रिय और छठे मन से अवग्रहादि चार के गुणा करने की अपेक्षा चौबीस भेद, अर्थावग्रह और व्यञ्जनावग्रह दोनों की अपेक्षा से अट्ठाईस भेद मतिज्ञान के होते हैं। इनको क्रम से तीन पंक्तियों में स्थापना करके इनका एक, छह और बारह के साथ यथाक्रम से गुणा करने पर मतिज्ञान के सामान्य, अर्ध और पूर्ण स्थान होते हैं ॥314॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका