चउसट्ठिपदं विरलिय, दुगं च दाउण संगुणं किच्चा।
रूऊणं च कए पुण, सुदणाणस्सक्खरा होंति॥353॥
अन्वयार्थ : उक्त चौंसठ अक्षरों का विरलन करके प्रत्येक के ऊपर दो अंक देकर सम्पूर्ण दो के अंकों का परस्पर गुणा करने से लब्ध राशि में एक घटा देने पर जो प्रमाण रहता है, उतने ही श्रुतज्ञान के अपुनरुक्त अक्षर होते हैं ॥353॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका