
देसोहिस्स य अवरं, णरतिरिये होदि संजदम्हि वरं।
परमोही सव्वोही, चरमसरीस्स विरदस्स॥374॥
अन्वयार्थ : जघन्य देशावधिज्ञान संयत या असंयत मनुष्य और तिर्यंचों के होता है। उत्कृष्ट देशावधिज्ञान संयत जीवों के ही होता है। किन्तु परमावधि और सर्वावधि चरमशरीरी महाव्रती के ही होता है ॥374॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका