
आवलिअसंखभागं, तीदभविस्सं च कालदो अवरं।
ओही जाणदि भावे, कालअसंखेज्जभागं तु॥383॥
अन्वयार्थ : जघन्य अवधिज्ञान काल से आवली के असंख्यातवें भागमात्र अतीत, अनागत काल को जानता है। पुनश्च भाव से आवली के असंख्यातवें भागमात्र काल प्रमाण के असंख्यातवें भाग प्रमाण भाव, उनको जानता है। जघन्य अवधिज्ञान पूर्वोक्त क्षेत्र में, पूर्वोक्त एक द्रव्य के, आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण अतीत काल में तथा तितने ही अनागत काल में जो आकाररूप व्यंजनपर्याय हुये थे तथा होंगे उनको जानता है। पूर्वोक्त क्षेत्र में पूर्वोक्त द्रव्य के वर्तमान परिणमनरूप आवली के असंख्यातवें भाग के असंख्यातवें भाग प्रमाण अर्थपर्याय जानता है। इसतरह जघन्य दशावधिज्ञान के विषयभूत द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावों की सीमा-मर्यादा के भेद कहे॥383॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका