जीवतत्त्वप्रदीपिका
पस्सदि ओही तत्थ असंखेज्जाओ हवंति दीउवही।
वासाणि असंखेज्जा होंति असंखेज्जगुणिदकमा॥396॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका