अंगुलअसंखभागे, दव्ववियप्पे गदे दु खेत्तम्हि।
एगागासपदेसो, वड्ढदि संपुण्णलोगो त्ति॥399॥
अन्वयार्थ : सूच्यंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण जब द्रव्य के विकल्प हो जाय तब क्षेत्र की अपेक्षा आकाश का एक प्रदेश बढ़ता है। इस ही क्रम से एक-एक आकाश के प्रदेश की वृद्धि वहाँ तक करनी चाहिये कि जहाँ तक देशावधि का उत्कृष्ट क्षेत्र सर्वलोक हो जाय ॥399॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका