
संखातीदा समया, पढमे पव्वम्मि उभयदो वड्ढी।
खेत्तं कालं अस्सिय, पढमादी कंडये वोच्छं॥403॥
अन्वयार्थ : प्रथम काण्डक में ध्रुवरूप से और अध्रुवरूप से असंख्यात समय की वृद्धि होती है। इसके आगे प्रथमादि काण्डकों का क्षेत्र और काल के आश्रय से वर्णन करते हैं ॥403॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका